मौर्य साम्राज्य की सम्पूर्ण जानकारी हिन्दी में

 

Hello Friends आज हम History का ही एक टाॅपिक मौर्य वंश या मौर्य साम्राज्य के बारें बहुत ही महत्वपूर्ण Post लेकर आयें है जो आपके लिए विभिन्न परीक्षाओं में महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है। आप सब जानते ही होगे की एक परीक्षा में General Knowledge कितना जरूरी होता है। अगर विद्यार्थियों को परीक्षा में सफलता प्राप्त करनी है तो सभी विषयों में अध्ययन जरूरी है। GK भी उन्हीं में से है जिसे पढे़ बिना सफलता प्राप्त नही की जा सकती है। इसलिए आज हम मौर्यकाल के बारें मे सम्पूर्ण जानकारी इस Post के माध्यम आप सब के लिए लाये है। जो परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी है और समय-समय पर परीक्षा में इससे सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते रहे है। मौर्य काल का Post हमारे द्वारा बहुत ही सरल तरीकों द्वारा बताया गया है। आप सम्पूर्ण लेख को ध्यान से पढ़िए और अपने मित्रों के साथ भी शेयर कीजिए ताकि वो भी इस लेख का पढ़ सके और अपनी तैयारी को एक नई दिशा दे।

 

मौर्यकाल का इतिहास

मौर्यकाल का संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य था। भारतीय साहित्य व यूनानी साहित्य से चन्द्रगुप्त मौर्य के बारें में कई नाम व उपाधियाँ मिलती है।

Maurya Kaal

चन्द्रगुप्त मौर्य (322-298 ई.पू.)-

  • चाणक्य की सहायता से चन्द्रगुप्त मौर्य ने नन्द वंश के अन्तिम शासक घनानन्द को मारकर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की।
  • मौर्य शासकों की राजधानी पाटलिपुत्र थी।
  • विशाखदत्त की रचना मुद्राराक्षस में चन्द्रगुप्त मौर्य को वृषल, प्रियदर्शन तथा चन्द्र श्री कहा गया है। जिसके आधार पर इन्हें निम्न कुल का माना जाता है।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य को यूनानी इतिहातकारों में स्ट्रेबो, एरियन तथा जस्टिन ने सेन्ट्रोकोट्टस, प्लूटार्क और एरियन ने एंड्रोकोट्टस तथा फिलाक्र्स ने सैड्रोकोटस कहा है।
  • सर विलियम जोन्स प्रथम इतिहासकार है जिन्होंने इन नामों का समीकरण चन्द्रगुप्त मौर्य से किया।
  • चन्द्रगुप्त का सर्वप्रथम उल्लेख पंतजलि के महाभाष्य में मिलता है जिसमें इसे चन्द्र नाम से सम्बोन्धित किया गया है जबकि अभिलेखों में सर्वप्रथम चन्द्रगुप्त का उल्लेख रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख मे मिलता है।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य ने (306 ई.पू.-305 ई.पू.) यूनानी शासक सेल्युकस को पराजित किया।
  • इस युद्ध में पराजित होने के पश्चात सेल्युकस ने अपने चार प्रान्त एरिया-हैरात, अराकोसिया-कन्धार, जेड्रोसिया-ब्लूचिस्तान तथा पेरीपेनिसदाई-काबुल  चन्द्रगुप्त को प्रदान किये।
  • सेल्युकस ने अपनी पुत्री हेलना का विवाह चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ कर दिया। हेलना का नाम कार्नेलिया भी प्राप्त होता है।
  • भारतीय इतिहास में इसे प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय विवाह माना जाता है।
  • बदले में चन्द्रगुप्त मौर्य ने सेल्युकस को 500 हाथी भेंट किये। मगध का क्षेत्र हाथियों के लिए प्रसिद्ध था। सेल्युकस से युद्ध व सन्धि का उल्लेख एप्पियानस के विवरण से प्राप्त होता है।
  • इस विजय के बाद चन्द्रगुप्त ने भारत मे एक बड़े साम्राज्य की स्थापना की।
  • प्लूटार्क द्वारा लिखित- चन्द्रगुप्त ने 6 लाख की सेना लेकर सम्पूर्ण भारत को रौंद दिया।
  • विन्सेंट स्मिथ- सम्पूर्ण भारतीय इतिहास में साम्राज्य की जिस सीमा को प्राप्त करने के लिए अंग्रेज भी तरसते रहे, उस सीमा को चन्द्रगुप्त मौर्य ने प्राप्त किया था।
  • जस्टिन ने चन्द्रगुप्त मौर्य की सेना का डाकुओं का गिरोह कहा।

नोट- सम्पूर्ण भारतीय इतिहास में सबसे बड़ा साम्राज्य क्षेत्र मौर्य शासकों का था।

  • प्लूटार्क व जस्टिन ने चन्द्रगुप्त मौर्य की सिकन्दर से भेंट का उल्लेख किया है।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य ने सौराष्ट्र (गुजरात) में अपने राज्यपाल पुष्पगुप्त के माध्यम से किसानों के हित में सुदर्शन झील का निर्माण करवाया।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म को अपनाया।
  • इनके समय में पाटलिपुत्र में प्रथम जैन संगीति का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता स्थूलभद्र ने की।
  • इस जैन संगीति मे जैन धर्म दो भागों में विभक्त हो गया।
  • स्थूलभद्र के नेतृत्व वाले उत्तर भारत के जैन श्वेताम्बर कहलाये। जबकि भद्रबाहु के नेतृत्व वाले दक्षिण में पलायन करने वाले जैन दिगम्बर कहलाये।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य भी भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) चले गये। जहाँ चन्द्रगिरि पर्वत पर सल्लेखना (उपवास) के द्वारा अपने प्राणों को त्याग दिया।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य की अंगरक्षक महिलाएं होती थी।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन के अन्तिम 12 वर्षो में पाटलिपुत्र में अकाल पड़ा था।

चन्द्रगुप्त मौर्य का राज्य विस्तार-

  • उत्तर में हिमालय से दक्षिण में मैसूर तक।
  • पश्चिमी में हिन्दूकुश से पूर्व में बंगाल तक।
  • चन्द्रगुप्त के साम्राज्य के अंग अफगानिस्तान व ब्लूचिस्तान का विस्तृत भू-भाग, सम्पूर्ण पंजाब, सिंधु प्रदेश, कश्मीर, नेपाल, दोआब क्षेत्र, मगध, बंगाल, कलिंग, सौराष्ट्र, मालवा व दक्षिण भारत के मैसूर तक।

चाणक्य/कौटिल्य/विष्णुगुप्त-

  • इन्होंने अर्थशास्त्र की रचना की जो राजनीति से सम्बन्धित ग्रन्थ है। इसकी भाषा संस्कृत है।इन्होंने अर्थशास्त्र की रचना की जो राजनीति से सम्बन्धित ग्रन्थ है। इसकी भाषा संस्कृत है।
  • अर्थशास्त्र में 15 अधिकरण तथा 180 प्रकरण प्राप्त होते है।
  • चाणक्य चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रधानमंत्री था।

मेगस्थनीज-

  • मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में राजदूत के रूप में आया था। जिसने यूनानी भाषा मे इण्डिका लिखी

बिन्दुसार- 298ई.पू. – 274 ई.पू. (24 वर्ष)

  • बिन्दुसार को यूनानी ग्रन्थों में अमित्रोचेट्टस/अमित्रघात कहा गया है।
  • अमित्रघात- शत्रुओं का नष्ट करने वाला।
  • ये आजीवक सम्प्रदाय के अनुयायी थे।
  • बिन्दुसार की सभा में 500 सदस्यों वाली एक मंत्रिपरिषद थी। जिसका प्रधान खल्लाटक था।
  • बिन्दुसार के शासनकाल में तक्षशिला में एक जनविद्रोह हुआ जिसे दबाने के लिए अशोक व सुसीम को भेजा गया।

नोट- भारत का प्राचीनतम विश्वविद्यालय तक्षशिला था, जिसकी स्थापना भरत के पुत्र तक्ष ने की। तक्षशिला में ही चाणक्य ने ज्ञान प्राप्त किया।

  • बिन्दुसार ने वैदेशिक सम्बन्धों को बढ़ावा दिया।
  • सीरिया के शासक ऐन्टीयोकस प्रथम ने अपने राजदूत डाईमेकस को बिन्दुसार के दरबार में भेजा।
  • मिस्र के शासक टाॅलमी फिलाडेल्फस-II ने अपने राजदूत डायनोसिस को बिन्दुसार के दरबार में भेजा।

अशोक- 273 ई.पू. – 232 ई.पू. तक

  • सिंहली अनुश्रुतियों मे अशोक को 99 भाईयों का हत्यारा कहा गया।
  • अशोक प्रारम्भिक जीवन में उज्जैन का राज्यपाल था।
  • वह पहले शैव सम्प्रदाय का अनुयायी था तथा बाद मे बौद्ध धर्म अपना लिया।
  • अशोक के बौद्ध होने के प्रमाण भाब्रू अभिलेख से प्राप्त होते है।
  • दीपवंश तथा महावंश गं्रथों (श्रीलंका) से पता चलता है कि अशोक को बौद्ध धर्म में निग्रोध ने दीक्षित किया।
  • दिव्यावदान के अनुसार अशोक को उपगुप्त ने दीक्षित किया।
  • अशोक के शासनकाल में पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध का संगीति का आयोजन हुआ।
  • इस बौद्ध संगीति की अध्यक्षता मोगलिपुत्र तिस्स ने की इसके अनुमानित समय 251 ई.पू. माना जाता है।
  • इस बौद्ध संगीति मे तीसरे पिट्क अभिधम्म पिट्क का संकलन किया गया।
  • अशोक ने चन्द्रगुप्त मौर्य के द्वारा बनवायी गई सुदर्शन झील का जीर्णोद्वार करवाया।
  • अशोक के समय यहां का राज्यपाल तुषास्प था।
  • अशोक के देवानाम् प्रियदर्शी की उपाधि धारण की।
  • उसने श्रीनगर तथा देवपत्तन (ललितपाटन) नामक नगरों की स्थापना करवाई।
  • अशोक ने लुम्बिनी नेपाल में भू-राजस्व की दर 1/6 के स्थान पर 1/8 कर दी।
  • अशोक के सम्बन्ध में जानकारी मुख्य रूप से उसके अभिलेखों से प्राप्त होती है।
  • ये अभिलेख एकाश्मक थे (एक ही पत्थर से बने हुये)
  • डी.आर. भण्डारकर एकमात्र इतिहासकार है, जिन्होंने अशोक के अभिलेखों के आधार पर मौर्य काल का इतिहास लिखा।
  • अशोक के अभिलेखों की भाषा प्राकृत, यूनानी और अरेमाईक थी।
  • सर्वप्रथम अशोक के अभिलेखों को पढ़ने मे सफलता 1837 में जेम्स प्रिसेंस ने की।
  • भारत में उपलब्ध अशोक के अभिलेख प्राकृत भाषा एवं ब्राह्मी लिपि में है तथा पाकिस्तान अभिलेखों की भाषा प्राकृत तथा लिपि खरोष्ठी है।
  • पाकिस्तान के मानसेहरा एवं शाहबाज गढ़ी से अशोक के अभिलेख प्राप्त हुये है।
  • 1750 में टीफैन्थेलर ने सबसे पहले अशोक के दिल्ली मेरठ अभिलेख की खोज की।
  • इन अभिलेखों के चार विभाजन है-

1. शिलालेख/वृहत् शिलालेख    2. लघुशिला लेख     3. स्तम्भ लेख    4. लघुस्तम्भलेख

  • अशोक के 14 – 14 वृहत् शिलालेख भारत में 8 स्थानों से प्राप्त हुये।

1. मानसेहरा- पाकिस्तान

2. शाहबाजगढ़ी- पाकिस्तान

3. जौगढ़- उड़ीसा

4. धौली- उड़ीसा

5. एर्रगुड़ि- आन्ध्रप्रदेश

6. सोपारा- महाराष्ट्र

7. गिरनार- गुजरात

8. कालसी- देहरादून (उत्तराखण्ड)

  • अशोक के अभिलेखों की चार लिपियाँ प्राप्त होती है।

 1. ब्राह्मीलिपि- यह लिपि बाँयें से दाँये ओर लेखन से सम्बन्धित है।

अशोक के भारत में प्राप्त लगभग सभी अभिलेख ब्राह्मी लिपि में है

2. खरोष्ठी लिपि- इसके अन्तर्गत लेखन दाँये से बाँयी ओर होता है। जैसे- उर्दू।

पाकिस्तान में प्राप्त मानसेहरा और शाहबाजगढ़ी के शिलालेख खरोष्ठी लिपि में है।

3. आरमाइक लिपि- यह लिपि ऊपर से नीचे की ओर लेखन से सम्बन्धित है। जैसे- गणित।

तक्षशिला तथा लघमान (अफगानिस्तान) से प्राप्त अभिलेख आरमाइक लिपि में है।

 4. यूनानी- अफगानिस्तान में शर-ए-कुना का अभिलेख इस प्रकार का है, इसे द्विलिपीय अभिलेख कहते है।

नोट- अशोक अपनी शांति नीति तथा धम्म संचालन के लिए इतिहास में प्रसिद्ध है। उसका धर्म जन कल्याण पर आधारित था।

  • अशोक के प्रथम शिलालेख में जीव-हत्या को निषेध घोषित किया गया है।
  • द्वितीय शिलालेख में अशोक ने सीमान्त राज्यों के सम्बन्ध में जानकारी दी है तथा उसके जन-कल्याणकारी कार्यो जैसे- कुएँ खुदवाना तथा छायादार वृक्ष लगवाना आदि की जानकारी प्राप्त होती है।
  • तृतीय शिलालेख में युक्त, राजुक, प्रादेशिक जैसे अधिकारियों के साथ अशोक द्वारा जनकल्याण हेतु राज्य का विचरण करने की जानकारी प्राप्त होती है।
  • पांचवें शिलालेख मे धर्ममहामात्र की नियुक्ति की जानकारी प्राप्त होती है, यह अधिकारी जनता के नैतिक उत्थान के लिए उत्तददायी था
  • अशोक के 12वें शिलालेख से उसकी धार्मिक सहिष्णुता की नीति प्राप्त होती है।
  • 13वें शिलालेख से कलिंग (उड़ीसा) पर आक्रमण तथा पश्चाताप सहित शांति नीति को अपनाने की जानकारी प्राप्त होती है।

नोट- अपने राज्याभिषेक के (269 ई.पू.) के आठवें वर्ष (261 ई.पू.) में अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया तथा वहाँ नन्दराज नामक शासक         को पराजित किया। इस युद्ध में 1 लाख से अधिक लोगों की  मृत्यु हुई।

  • प्रथम पृथक शिलालेख (कलिंग) में अशोक ने सम्पूर्ण प्रजा को अपनी सन्तान कहा है।
  • अशोक के मेरठ (यू.पी.) तथा टोपरा (हरियाणा) के अभिलेखों को फिरोजशाह तुगलक सुरक्षा की दृष्टि से दिल्ली लेकर आया था। (सल्तनकाल का अकबर- फिरोज तुगलक)
  • मुगल सम्राट अकबर कौशाम्बी अभिलेख को इलाहाबाद लेकर आये। कौशाम्बी में अभिलेख में अशोक की रानी कारूवाकी का नाम प्राप्त होता है अतः इसे रानी का अभिलेख भी कहते है।
  • इस अभिलेख के अनुसार अशोक के एक पुत्र का नाम तीवर था।
  • भाब्रू का अभिलेख सबसे लम्बा अभिलेख माना जाता है जिसकी खोज कैप्टेन बर्ट ने की।
  • रूमिन्नदेई (नेपाल) का अभिलेख अशोक का सबसे छोटा अभिलेख माना जाता है जिसमें अशोक के द्वारा राज्याभिषेक के 20वें वर्ष में लुम्बिनी की यात्रा का उल्लेख प्राप्त होती है।
  • निगालीसागर, नेपाल अभिलेख से जानकरी मिलती है कि अशोक ने कनकमुनि बुद्ध के स्तूप को विस्तृत करवाया।
  • अशोक ने अपने राज्याभिषेक के दसवें वर्ष में बौद्ध गया की यात्रा की।
  • अशोक के चार अभिलेखों से उसका नाम प्राप्त होता है- गुर्जरा- मध्य प्रदेश, मास्की- कर्नाटक, उदैगोलम- कर्नाटक, निट्टूर- कर्नाटक। दो अभिलेखों गुर्जरा व मास्की में उसे देवानाम प्रियदर्शी कहा गया है।

अशोक के स्तम्भ लेखों का विवरण-

1. सारनाथ- सारनाथ (उत्तरप्रदेश) से भारत का राजकीय चिह्न प्राप्त किया गया। यहाँ चार सिंहों की संयुक्त मूर्ति प्राप्त है। इस अभिलेख में         चार पशु दर्शाये गये है। हाथी, घोड़ा, शेर और बैल।

2. साँची- मध्यप्रदेश में भी सारनाथ के समान चार सिंहों की संयुक्त मूर्ति है। तथा दाना चुगते हंसों का चित्रण है।

3. लौरिया नन्दनगढ़ (बिहार)- एक शेर

4. बसाढ़ (बिहार)- एक शेर (मयूर का चित्रण भी इस स्तम्भ पर प्राप्त है)

5. रामपुरवा-I (बिहार)- एक शेर

6. रामपुरवा-II (बिहार)- एक साँड़/बैल

7. संकिसा (मध्यप्रदेश)- एक हाथी

अशोक ने आजीवक सम्प्रदाय के भिक्षुओं के लिए बिहार में बराबर की गुफाओं का निर्माण करवाया।

कुणाल- कुणाल दृष्टिहीन था, बहुत कम प्रमाण मिलते है कि अशोक के बाद कुणाल को शासक के रूप में स्वीकार करते थे।

सम्प्रति- यह जैन धर्म का अनुयायी था।

दशरथ- यह आजीवक सम्प्रदाय का अनुयायी था। इसने भी देवानामप्रियदर्शी की उपाधि धारण की थी।दशरथ ने आजीवक सम्प्रदाय के भिक्षुओ के लिए बिहार मे नागार्जुनी गुफाओं का निर्माण करवाया।

वृहद्रथ- (बौद्ध धर्म) यह मौर्य वंश का अन्तिम शासक था, जिसकी हत्या करके 185 ई.पू. मं शुंग वंश के शासक पुष्यमित्र शुंग ने नये साम्राज्य की स्थापना की।

मौर्य साम्राज्य के पतन के कारण-

1. शान्ति नीति- हेमचन्द्र राय चैधरी

2. ब्राह्मणों की प्रतिक्रिया- हर प्रसाद शास्त्री

3. अत्यन्त केन्द्रीयकृत शासन व्यवस्था- रोमिला थापर

4. वित्तीय समस्याएँ- डी.डी. कोशाम्बी

मौर्य प्रशासन- मौर्यकाल की शासन व्यवस्था अत्यन्त केन्द्रीकृत थी।

प्रशासनिक इकाईयाँ-

1. देश- सम्पूर्ण साम्राज्य (राजा)

2. राज्य/प्रान्त- प्रान्तपति

3. आहार/विषय (जिला)- विषयपति

4. स्थानीय- 800 गाँवों का समूह

5. द्रोणमुख- 400 गाँवों का समूह

6. खार्वटिक- 200 गाँवों का समूह

7. संग्रहण- 100 गाँवों का समूह

8. ग्राम- सबसे छोटी इकाई

मौर्यकाल में प्रशासनिक अधिकारी-

चाणक्य के अनुसार राजा की सहायता के लिए 18 मंत्री या अधिकारी होते थे जिन्हें तीर्थ कहा जाता था।

1. प्रधानमंत्री- राजा के बाद सबसे शक्तिशाली अधिकारी

2. पण्याध्यक्ष- व्यापार से सम्बन्धित मुख्य अधिकारी

3. विविताध्यक्ष- चारागाहों का प्रमुख

4. आकराध्यक्ष- खानों का प्रमुख5. समाहर्ता- भू-राजस्व संगृकर्ता अधिकारी

6. सन्निधाता- कोषाध्यक्ष

7. सीताध्यक्ष- राजकीय भूमि से सम्बन्धित अधिकारी

8. लक्षणाध्यक्ष- राजकीय टकसाल का मुख्य अधिकारी

9. दण्डपाल- पुलिस अधिकारी

10. आटविक- वन प्रदेश से सम्बन्धित अधिकारी

11. पौतवाध्यक्ष- माप-तौल से सम्बन्धित अधिकारी

12. प्रदेष्टा- फौजदारी मामलों का न्यायधीश

13. व्यावहारिक- दीवानी मामलों का न्यायाधीश

14. रूपदर्शक- सिक्कों की शुद्धता जांचने वाला अधिकारी

15. कर्मान्तिक- उद्योगधन्धों से सम्बन्धित अधिकारी

मौर्यकाल में गुप्तचर- दो प्रकार के गुप्तचर होते थे-

1. संचारा- विचरण करते हुये सूचना एकत्रित करने वाले गुप्तचर।

2. संस्था- एक ही स्थान पर रूककर सूचना इकट्ठी करने वाले गुप्तचर।

मौर्यकाल में न्यायालय-

दो प्रकार के न्यायालय

1. धर्मस्थीय- दीवानों मामलों (धन सम्बन्धी) का न्यायालय।

2. कण्टकशोधन- फौजदारी मामलों से सम्बन्धित न्यायालय।

मौर्यकाल के सिक्के-

1. सोने के सिक्के- सुवर्ण, निष्क।

2. चाँदी के सिक्के- पण, कार्षापण।

3. ताँबे के सिक्के- माषक, काकणी।

मौर्यकाल में राजधानियाँ-

इतने बड़े साम्राज्य को व्यवस्थित करने के लिए 5 राज्य व राजधानियाँ थी।

1. उत्तरापथ- तक्षशिला

2. दक्षिणापथ- सुवर्णगिरि

3. अवन्ति- उज्जैन

4. कलिंग- तोसली

5. मध्य प्रदेश (प्राची)- पाटलिपुत्र

मौर्यकाल के बन्दरगाह-

मौर्यकाल के इतिहास में दो बन्दरगाह प्रसिद्ध थे-

1. भृगकच्छ- यह बन्दरगाह भारत के पश्चिमी सीमा पर स्थित था जो अब गुजरात में है।

2. ताम्रलिप्ति- यह बन्दरगाह पूर्वी सीमा का प्रसिद्ध बन्दरगाह था जो बंगाल में स्थित है।

अशोक के द्वारा भेजे गए धर्म प्रचारक-

1. मज्झन्तिक- कश्मीर व तक्षशिला

2. महारक्षित- यवन (यूनान क्षेत्र)

3. महाधर्मरक्षित- महाराष्ट्र

4. महादेव- महिष्मंडल (मैसूर)

5. संघमित्रा, महेन्द्र- श्रीलंका

मेगस्थनीज के अनुसार भारतीय समाज सात वर्गो में बंटा हुआ था-

1. दर्शनिक

2. सभासद्

3. किसान

4. आभीर (अहीर/ग्वाले)

5. सैनिक

6. शिल्पी

7. निरीक्षक

कौटिल्य का सप्तांग सिद्धान्त-

कौटिल्य के अनुसार राजतंत्र के लिए सात अंगों की अनिवार्यता मानी गई है।

1. राजा

2. जनपद

3. बल (सेना)

4. दुर्ग

5. कोष

6. मित्र

7. अमात्य (मंत्री)

मौर्यकाल में स्थापत्य कला-

अशोक के अभिलेख स्थापत्य की श्रेष्ठता के उदाहरण है। इसके अलावा मौर्यशासकों द्वारा बनवाये गये लकड़ी के महल विशिष्ट थे।

फाह्यान् ने लिखा है मौर्यकाल के ये महल देवताओं ने अपने हाथों से बताये है।

एरियन ने मौर्यकाल के महलों को सूसा व एकबतना के महलों से सुन्दर बताया है।

मौर्यकाल मूर्तिकाल-

इस युग में यक्ष व यक्षी की मूर्तियाँ मुख्य रूप से प्राप्त होती है।

मेगस्थनीज के अनुसार मौर्यकाल में शासनकाल पाँच-पाँच लोगोें की छः समितियों द्वारा चलाया जाता था। (कुल-30)

कर व्यवस्था-

मौर्यकाल में कर व्यवस्था निम्न प्रकार में बंटी हुई थी। जो इस प्रकार है।

1. सीता- राजकीय भूमि पर लगने वाल कर।

2. भाग- किसानों की भूमि का लगने वाला कर।

3. उद्रंग- सिंचाई कर।

4. रज्जू- भूमि की माप के बदले लिया जाने वाला कर।

5. विष्टि- बेगार श्रम।

6. प्रणय- आपातकाल में लिया जाने वाला कर।

7. हिरण्य (सोना)- अनाज के स्थान पर नकद लिया जाने वाला कर।

मौर्यकाल की जानकारी निम्न स्त्रोतों से प्राप्त होती है-

1. कौटिल्य- अर्थशास्त्र

2. मेगस्थनीज- इण्डिका

3. सोमदेव- कथासरित्सागर

4. क्षेमेन्द्र- वृहत्कथामंजरी

5. हेमचन्द्र- परिशिष्टपर्वन

6. भद्रबाहु- कल्पसूत्र

7. विशाखदत्त- मुद्राराक्षस

8. रूद्रदामन- जूनागढ़ अभिलेख

9. अशोक के अभिलेख

10. विष्णु पुराण

 

 

 

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